तोरबाज़ फिल्म का हिंदी में रिव्यू, फिल्म में क्या अच्छा है और क्या बुरा, किरदार, फिल्म की कहानी का प्लाट

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जैसा की आप सभी जानते हैं की संजय दत्त(संजू बाबा) कुछ समय पहले हॉस्पिटल में एडमिट हुए थे कैंसर जैसी घातक बीमारी के चलते। उनके फैंस की दुआओ का असर है की वह अब काफी ठीक हो चुके हैं। अगर संजू बाबा के फ़िल्मी टॉपिक की बात की जाये तो उनके ठीक होकर वापिस आने के बाद इस फिल्म पर बहुत से लोगो की नज़र थी क्यूंकि इससे पहली फिल्म सड़क 2 का हाल तो आप सभी को पता ही है।

कैसी है तोरबाज़ फिल्म?
फिल्म तोरबाज़ आतंकवाद के बीच जिंदगी की खुशियों को तलाशते बच्चों की कहानी हैं जोकि तालिबान में जी रहे हैं और वहां हर रोज़ संघर्ष करते हैं अपने अगले दिन की जिंदगी के लिए। अफगानिस्तान की परिस्थितियों से सभी लोग परिचित हैं जहाँ हर दिन गोली और दहसत में गुजरता है ऐसा होने के कारन वहां के लोग अपने करियर की तो बाद में सोचते हैं पहले अपने जीवन की चिंता करते हैं।

फिल्म निर्देशक गिरीश मालिक ने मुद्दा काफी संगीन चुना था और सच कहें तो अफगानिस्तान की सचाई लोगो के सामने प्रस्तुत करना भी काबीले तारीफ काम है। फिल्म में आपको संजय दत्त मुख्य भूमिका में नज़र आते हैं जोकि अपने परिवार के सांथ हुए आतकवादी घटना से काफी टूट चुके हैं लेकिन फिर भी वह अब तालिबान के बच्चों को एक सुन्दर भविष्य देना चाहता है।

फिल्म काफी संजीदा मुद्दों पर है इसलिए फिल्म में शायद बच्चों की हंसी और इमोशंस का सहारा लिया गया है ताकि लोग इस कहानी जल्दी और इमोशनली जुड़ सकें। बच्चों का होना फिल्म को बहुत हद तक कामयाब कर देता है लेकिन बड़े कलाकारों की बात करें तो कुछ ही किरदार ऐसे है जोकि अपनी पहचान परदे पर छोड़ पाए।

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क्या तोरबाज़ फिल्म हमें देखनी चाहिए?
फिल्म में बच्चों का काम आपको काफी रोमांचित कर देगा लेकिन फिल्म की कहानी में ऐसी कुछ जान नहीं इसलिए अब यह निर्णय आपको ऊपर है की क्या आप इसे अपने परिवार के सांथ देखोगे या नहीं।

तोरबाज़ फिल्म रेटिंग कितनी है?
तोरबाज़ फिल्म को IMDB पे 10 में से 5.7 की रेटिंग मिली है और गूगल पर इसे 78% लोगो ने पसंद किया है लेकिन हम इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार देंगे।

कलाकारों की परफॉरमेंस
फिल्म में अच्छी परफॉरमेंस की बात की जाये तो सभी बच्चों ने बहुत ही अच्छा काम किया है इसलिए बच्चों की कास्टिंग के लिए इस फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर की तारीफ जरूर होनी चाहिए। उसके बाद फिल्म को अपने कन्धों पर लेकर चलने में संजय दत्त काफी ज्यादा कामयाब हुए हैं इसलिए आप उनके दृश्यों को फिल्म में काफी एन्जॉय करोगे।

राहुल देव का काम आपको सच में एक दहसत से भरे हुए आतंक का चेहरा दिखता है जिसके लिए राहुल देव की तारीफ की जानी चाहिए हलाकि इनका दृश्य आपको फिल्म में उतने ज्यादा नहीं देखने को मिलते हैं लेकिन फिर भी वह फिल्म में अपनी मौजूदगी से सबका दिल जीत लेते हैं।

तोरबाज़ फिल्म में क्या अच्छा है?
तोरबाज़ फिल्म की सिनेमेटोग्राफी
काफी ज्यादा बेहतरीन जिससे है आपको एक बड़े बजट की फिल्म को देखने का अनुभव होता है। फिल्म को देखने पर भी आपको एक अच्छी क्वालिटी की फिल्म देखने का अनुभव होता है जिसके लिए ग्रीश मालिक को जाना जाता है। 

तोरबाज़ फिल्म में क्या बुरा है?
तोरबाज़ फिल्म का स्क्रीनप्ले
बहुत ही ज्यादा ढीला है इसलिए फिल्म शुरू होने के कुछ समय बाद ही आप बोरियत सी महसूस करने लगोगे लेकिन सबसे ज्यादा बुरा तब लगता है जब फिल्म के आखिर में मैच को भी ज्यादा रोमांचक नहीं बनाया गया है इसलिए आप ज्यादा निराश होते हो। 

तोरबाज़ फिल्म में म्यूजिक की बात की जाये तो वह इतना खास नहीं है की आप उसे सुनकर बहुत ज्यादा प्रेरित हो जाये।

फिल्म अफगानिस्तान में बच्चों के बीच आतंक को भूलकर उन्हें क्रिकेट के खेल के प्रति आगे बढ़ाना है लेकिन फिल्म में क्रिकेट मैच के बहुत ही कम दृश्य हैं इसलिए दर्शक इस भाव से नहीं जुड़ पा रहे हैं।

फिल्म में बहुत से किरदारों को सिर्फ एक दो दृश्य ही दिए हैं।

तोरबाज़ फिल्म के किरदार
संजय दत्त: नसीर, नरगिस फाखरी: आयेशा, राहुल देव: क़ज़र, बाबरक अकबरी: दिवाकर धयानी: अफ़ग़ान मेजर, हुमायूँ शम्स खान: मेजर हुमायूँ, राहुल मित्तरा: अफ़ग़ान आर्मी हेड, दलजीत सीन सिंह: फादर ऑफ़ निआज़, जय पटेल: मेहरबान

चाइल्ड एक्टर्स ऐशन जावेद मालिक, हामिद शफी, मुहम्मद खैरखाह, रूद्र सोनी

तोरबाज़ फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी एक पूर्व सैनिक नासिर खान से शुरू होती है जोकि अपने परिवार को खो देने के बाद अपने मित्र आयशा की अनुरोध पर दोबारा अफगानिस्तान आता है और यहाँ जब वह बच्चों को क्रिकेट खेलता देखता है और महसूस करता है इनकी मदद करनी चाहिए नहीं तो इनका बचपन भी गोली और बारूद में कहीं खो जायेगा।

बचे भी अब अपने आपसी भेदभाव को भूलकर इस खेल को सिखने में लग जाते हैं लेकिन उनके लिए मुश्किल लेकर आता है क़ज़र जोकि एक आतंकवादी है और बच्चों को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकता। अब नासिर कैसे इन बच्चों में खेल की भावना को बनाये रखता है और उन्हें एक बेहतर करियर देता है इसी के ऊपर यह फिल्म की कहानी है।

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