लूडो फिल्म का हिंदी में रिव्यू, फिल्म में क्या अच्छा है और क्या बुरा, किरदार, फिल्म की कहानी का प्लाट

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कैसी है लूडो फिल्म?
अगर आप इस फिल्म को देखने से पहले अपने सांथ हाजमोला लेकर नहीं बैठे तो सच में यह फिल्म आपको हज़म होने वाली नहीं है। डायरेक्टर अनुराग कश्यप जिन्हे जाना जाता है सिंपल और सीधी साधी फिल्में बनाने के लिए उन्होंने इस बार एक नई कोशिश की है हॉलीवुड की कई बेहतरीन मल्टी स्टोरी वाली फिल्म की तरह एक नई फिल्म भारतीय दर्शकों के लिए लाने की। मगर सच कहें इसे बनाते हुए डायरेक्टर और स्टोरी लेखक कहानी में इतना ज्यादा गुम हो गए की उन्होंने किसी दृश्य को हज़म न करने की सारी सीमाएं ही पार कर दी।

फिल्म का कांसेप्ट बॉलीवुड इंडस्ट्री के लिए काफी नया जरूर है लेकिन जो लोग हॉलीवुड और साउथ की फिल्मों के फैंस हैं उनके लिए इसमें कुछ नया नहीं है। जहाँ डायरेक्टर ने चार कहानियों को लेकर अपनी फिल्म को कांसेप्ट रखा है और चारों कहानियों के किरदार एक दूसरे किरदारों से काफी अलग है। कहानी में कई एंगल देखने को मिलते हैं जिससे फिल्म थोड़ा अछि जरूर बन जाती है। फिल्म को रोचक बनाने के लिए कहानी बहुत तेज़ी से भागती हुई नज़र आती है मगर हो सकता है इसके कारण आप थोड़ा कंफ्यूज हो जाएं।

फिल्म के कई दृश्यों को देखने पर एहसास होगा की बहुत सारे दृश्य राजनीति और धर्म विशेष को निशाना बनाते हुए लिखे गए हैं जबकि उन दृश्यों के न होने से फिल्म में कोई प्रभाव नहीं पड़ता या उसे अच्छे से दिखाया जा सकता था लेकिन शायद फिल्म के बनाने वाले ने इन दृश्यों को फिल्म में बबाल खड़ा करने के लिए डाला है जिससे उनकी फिल्म की चर्चा हो जाये। 

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अब फिल्म को हज़म न कर पाने की बात की जाये तो फिल्म जरूरत से ज्यादा तेज़ी से भागती हुई नज़र आती है जहाँ फिल्म में फाइट और कई दृश्य ऐसे हैं जिन्हे देखकर आपको इसे देखकर इसके बनाने वाले की बुद्विमता पर शक जरूर होगा –

पंकज त्रिपाठी – पंकज त्रिपाठी जोकि एक मशहूर गुंडा है इसलिए जाहिर है की उसका निशाना तो अच्छा होना ही चाहिए लेकिन एक व्यक्ति को सिर्फ 3 फ़ीट की दूरी से गोली मारता है और उसे गोली नहीं लगती, लेकिन फिर पंकज त्रिपाठी उसे छोड़कर बाहर आ जाता है जहाँ वह व्यक्ति भागने लगता है। भागते वक़्त उसकी दूरी 10 फ़ीट से ऊपर होती है लेकिन यहाँ से गोली उसे लग जाती है लेकिन वह भी ठीक से नहीं लगती। पंकज त्रिपाठी फिर तीसरी बार मारता है जबकि उसकी दूरी अब 15 फ़ीट की है लेकिन अब गोली लग जाती है। 

फिल्म में दिखाया जा रहा है की पंकज त्रिपाठी कितनी ही कोशिशों के बावजूद मरता नहीं है जिसे देखकर आपको लगेगा की डायरेक्टर ने गप की इन्तहा कर दी है। 

फिल्म में नर्स का किरदार निभा रही पार्ले माने को पैसे मिलने के बावजूद वह हॉस्पिटल जाती है अपनी जॉब करने के लिए क्यों? मजे की बात तो यह है की पंकज त्रिपाठी भी उसी हॉस्पिटल में आ जाता है भर्ती होकर – मतलब कुछ भी।

इस तरह से बेइंतेहा दृश्य आपको न हज़म होने वाले दिखेंगे जिसे डार्क कॉमेडी के नाम पर दिखाकर बस लोगो के पैसे काटने की कोशिश की जा रही है। 

क्या लूडो फिल्म हमें देखनी चाहिए?
हमारी राय में तो अगर आप अपने दिमाग को बगल में रख कर इस फिल्म को देख सकते हैं तो यह फिल्म आपके लिए ही बनी है। यह फिल्म पारिवारिक बिलकुल भी नहीं है इसलिए कृप्या सावधानी बनाये रखें।

क्या लूडो फिल्म की रेटिंग कितनी है?
लूडो फिल्म को IMDB पे 7.6 रेट मिला है 10 में से। हम इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार देंगे।

क्या लूडो फिल्म में क्या अच्छा है?
फिल्म में काफी मझे हुए किरदार आपको नज़र आएंगे जिनके अभिनय की बात की जाये तो उन्होंने अपने दिए रोल को अच्छे से निभाया है।

पंकज त्रिपाठी: पंकज त्रिपाठी अपने सख्त किरदार से बाहर निकलते हुए एक कॉमेडी और चुलबुल किस्म के किरदार को निभाते हुए नज़र आते हैं इसलिए इस फिल्म में उनका काम सबसे ज्यादा पसंद किया गया है।

राजकुमार राव ने अपने किरदार को बहुत ही अच्छे से निभाया है लेकिन उनके किरदार में कहीं भी ठहराव नहीं है जिससे वह अपने इस किरदार से दर्शकों को जुड़ने का मौका दे पाते।

आदित्य रॉय कपूर के किरदार तो बस लोगो को कंफ्यूज करने के लिए इस फिल्म में रखा गया है जोकि एक तरफ तो आदर्श इंसान है लेकिन कोई भी रिलेशन बनाने के लिए सबसे आगे है। यह एक कॉमेडियन है जिसके जोक्स पर सिर्फ लिखने वाला ही हंस सकता था बाकि इस किरदार ने पूरी फिल्म में कोई भी जोक नहीं मारा है। किरदार को लिखने में इतनी जल्द बाज़ी क्यों की गयी है समझ से परे है।

रोहित सरफ के किरदार से आप जरूर खुश होंगे क्यंकि जिस तरह का मासूम उन्हें दिखाना था उतना ही उन्होंने अपने आप को परदे पर उतारा है।

अभिषेक बच्चन अपने पुराने अंदाज़ में नज़र आते हुए नज़र आएंगे मगर उन्हें एक भी एक्शन दृशय नहीं दिया गया इसलिए कुछ बुरा जरूर लगेगा।

फिल्म आप ज्यादा बोर नहीं होंगे क्यूंकि फिल्म का पेस आपको बांधे रखने में सक्षम है।

लूडो फिल्म में क्या बुरा है?
फिल्म इतनी तेज़ी से भागती है अगर आपने कुछ भी दृश्य छोड़ दिए तो आपको समझ नहीं आएगा क्यूंकि इसमें कुछ भी कहीं भी जुड़ जाता या हट जाता है।

फिल्म के कुछ किरदार तो अच्छे से लिखे गए हैं मगर बहुत सारे किरदार तो बस फिल्म को धक्का मारने के लिए रखे गए हैं जैसे आदित्य रॉय कपूर, राजकुमार राव, पर्ल माने।

लेखक ने कहानी में बगैर रिसर्च करे कई बातें गलत दिखाई हैं जोकि भारत में रहने वाला हर एक बच्चा बता सकता है फिर कैसे लेखक ने ऐसी गलती कैसे करी।

लूडो फिल्म फिल्म का डायरेक्शन, स्क्रीनप्ले और म्यूजिक कैसा है?
फिल्म का डायरेक्शन बहुत लोअर दर्जे का हैं जहाँ आपको लगेगा की फिल्म के ऊपर कोई भी खर्चा नहीं किया गया है। बहुत सारे दृश्यों में आपको साफ़ पता लगेगा की यह एक सेट है जहाँ पर बैकग्राउंड बहुत अलग दिख रहा है। शूटिंग को बहुत हद तक सेट में ही शूट किया गया है लेकिन फिर भी इसमें काफी कमियां देखने पर पता लग जाएँगी जोकि बहुत हद तक आपका मज्जा किरकरा कर देती हैं।

स्क्रीनप्ले ने ही इस पूरी फिल्म की इज्जत डुबाई है, फिल्म में थोड़े बहुत न हज़म होने वाले दृश्य चलते हैं लेकिन अगर आप ऐसे दृश्य डालेंगे जोकि फिल्म बनाने वाले के ऊपर ही सवाल खड़ा कर दे तो सच में फिल्म की कहानी सच में बहुत ख़राब लिखी गयी है। यहाँ किरदार अपने रोल को निभा तो रहे हैं मगर उतना समय नहीं मिल पाया की दर्शकों से जुड़ पाते तो कुछ किरदार का होना ही फिल्म में सवाल खड़े कर रहा है।

म्यूजिक फिल्म का बहुत हद तक अच्छा है जोकि स्मूथ और शांत कर देने वाला है।

लूडो फिल्म फिल्म के किरदार
अभिषेक बच्चन: बिट्टू तिवारी, आदित्य रॉय कपूर: आकाश चौहान, सैन्य मल्होत्रा: श्रुति चौकसी, राजकुमार राव: अलोक कुमार गुप्ता, फातिमा सना शैख़: पिंकी, अनुराग बासु: यमराज, अमन भगत: शेखर, पार्ले माने: श्रीजा थॉमस, आशा नेगी: आशा, कृष्ण राठी: सत्तू, रोहित सरफ: राहुल अवस्थी, विशाल तिवारी: गुंडा, पंकज त्रिपाठी: राहुल सत्येंद्र, शालिनी वत्स: लता कुट्टी      

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