आर्मी जवान के जीवन की लड़ाई जंग और जिंदगी दोनों में चलती है। जीत की जिद सीरीज का रिव्यू, सीरीज में क्या अच्छा है और क्या बुरा, किरदार, सीरीज की कहानी का प्लाट

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कैसी है जीत की ज़िद्द सीरीज?
किसी देश की रक्षा की बागडोर उसके फौजी जवान के हाथ में होती है ऐसे में उन जवानो का फिजिकली और मेंटली सख्त होना बहुत जरूरी होता है। लेकिन क्या हो अगर एक जवान को जब हमारे समाज के सपोर्ट की जरूरत हो और हम बेरुखी से उनसे पेश आकर उनका अपमान करें, जी हाँ सुनने में अजीब लगता है लेकिन यह एक कड़वी सचाई है की समाज में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जोकि किसी भी सैनिक दवारा किये जाने वाले त्याग को बिलकुल सामान नहीं देते। अगर कोई जवान किसी दुखद तरीके से घायल होकर हैंडीकैप हो जाये तो लोग इसका फायदा उठाने को भी तैयार रहते हैं।

जीत की ज़िद्द सीरीज कहानी एक सच्ची कहानी पर आधारित है जोकि मेजर दीपेंद्र सिंह सेंगर के जीवन के संघर्षों, जूनून और जिद की जीत को बयान करती है। एक जवान जिसके जीवन का लक्ष्य ही है दुश्मनो को सबक सीखना और अपने देश को हमेशा खतरों से दूर रखना है। लेकिन जब एक चुनौती मेजर के जिंदगी में आती है शारीरिक रूप से तो इससे जवान को क्या परेशानियां आती है और वह इन परेशानियों का मुकाबला कैसे करता है यही इस सीरीज में बताने की कोशिश की गई है।

डायरेक्टर विशाल मंगलोरकर द्वारा निर्मित और सिद्धार्थ मिश्रा द्वारा लिखी गयी यह सीरीज काफी प्रभावित करने वाली है क्यूंकि इन्होने इस सीरीज को न सिर्फ एक जवान की जंग की जिंदगी को बयान किया है बल्कि यह बताने की कोशिश की है की जब एक जवान को हमारी जरूरत होती है तो हम लोग कितने मतलबी हो जाते है। लेकिन एक जवान हमेशा जवान ही रहता है इसलिए वह अपनी ज़िद्द को जीत में बदलने की क्षमता रखता है चाहे वह कोई भी जंग हो।

सीरीज को देखकर पाता चलता है की एक जवान के लिए हर दिन ही जंग है जिसे डायरेक्टर ने बखूबी परदे पर उतारा है। इस सीरीज को देखने पर आप के अंदर जोश की लहर जरूर उठेगी और आप अपनी जिंदगी में हर काम को लेकर एक ज़िद्द बना लेंगे इसलिए सच कहें तो बहुत हद्द तक फिल्म जरूर कामयाब हुई है।

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क्या जीत की ज़िद्द सीरीज देखनी चाहिए?
जी हाँ, यह सीरीज काफी प्रेरणादायक, जोश से भरी हुई और जीवन में किसी चीज़ को पाने की ज़िद्द को जीत में बदलने की भूख को दर्शाती है। इस सीरीज को आप अपने परिवार के सांथ बैठकर देख सकते हैं।

जीत की ज़िद्द सीरीज रेटिंग कितनी है?
जीत की ज़िद्द सीरीज को IMDB पे 10 में से 8.9 की रेटिंग मिली है और हम इस सीरीज को 5 में से 3 स्टार देंगे।

परफॉरमेंस
अमित साध जोकि पहले भी एक आर्मी जवान के किरदार को निभा चुके हैं उन्हें एक आर्मी जवान के रोल में देखकर सच में काफी अच्छा लगता है। वह एक आर्मी के जवान के रोल के सांथ पूरा न्याय करते हुए नज़र आते हैं। इस सीरीज में भी उन्होंने अपनी तरफ से बेस्ट देने की कोशिश की है इसलिए उनके जोश, जूनून, चिड़चिड़ापन उनकी बेबसी आपको सच में अंदर से हिल्ला देती है।

सुशांत सिंह के किरदार की बात की जाए तो वह अपनी आवाज़ से तो एक कड़क फौजी के रूप में नज़र आ रहे थे परन्तु शारीरिक तौर पर न जाने क्यों वह बहुत ही ढीले से दिख रहे थे। हो सकता है की वह अपने किरदार को अंदर से सख्त दिखने की कोशिश कर रहे हो लेकिन फिर भी लोगो के दिमाग में एक फौजी की तस्वीर एक शारीरिक और मानसिक रूप सख्त व्यक्ति के तौर पर होती है इसलिए कहीं न कहीं वह थोड़ा कम लगता है। 

अदाकारी की बात की जाये तो सुशांत का काम भी आपको पसंद आएगा। सुशांत की डायलॉग डिलीवरी और उनका टेड़ा रवैया एक मेंटर के रूप में काफी अच्छा लगता है।

अमृता पूरी की अदाकारी भी आपके मन को छू लेगी, उनके किरदार से आपको एक फौजी की जिंदगी से जुड़े सभी लोगो की परेशानियां और चिंता समझ आएँगी जोकि उनके अच्छे काम को साबित करती है।

जीत की ज़िद्द सीरीज में क्या सही है?
जीत की ज़िद्द
सीरीज का जोश और इसका स्क्रीनप्ले काफी इमोशनल है जोकि अच्छे से एक फौजी के जीवन को परदे पर लाने में कामयाब हुआ है।

जीत की ज़िद्द का बैकग्राउंड म्यूजिक आपको कहानी के अनुसार लगता है जोकि आपके अंदर माहौल के अनुसार सीरीज में बाधें रखने में कामयाब होता है।

सीरीज में किरदारों के चरित्र निर्माण में अच्छा समय दिया गया है इसलिए आप उनसे अच्छे से जुड़ पाते हैं।

सीरीज में कहानी के अंत में असल जिंदगी के मेजर का दर्शकों से बात करना सच में हमें यह एहसास दिलाता है की यह कहानी सुनने में जितनी चुनौतीपूर्ण लगती है कोई इस जिंदगी को रोज़ जीता है जोकि काफी अच्छा लगता है।

जीत की ज़िद्द सीरीज की कमियां
बात की जाए अगर आर्मी की तो उसमे जंग के दृश्य इस तरह से बचकाने शूट किये जाये तो आप सच में डायरेक्टर को ही इसका कसूरवार मानोगे क्यूंकि इस सीरीज के लड़ाई के सिर्फ कुछ ही दृश्य हैं और वह भी ऐसे बनाये गए हैं की खर्चा कम पैसा ज्यादा वाली भावना को जागृत करता है जहाँ डायरेक्टर ने खर्चा कम से कम करने की ठानी हुई हुई है।

जीत की ज़िद्द के टेक्निकल क्षेत्र की बात की जाए तो पत्ता नहीं क्यों बहुत सारे वेब सीरीज की टीम को ऐसा क्यों लगता है की दर्शक को आप जो भी दिखा देंगे वह उस बात को मान जायेगा। इस सीरीज में जब गोली चलती हैं और हेलीकॉप्टर के दृश्य आते हैं तो आपको गलतियां साफ़ देखेगी की यह असली दृश्य नहीं है।

जीत की जिद में थोड़ा कमी यह भी लगती है की जब मेजर हैंडीकैप हो जाते हैं तो उनके जिंदगी की परेशानियां बहुत ही जल्दी में दिखाई गयी हैं इसलिए दर्शक इमोशनल मेजर से जुड़ते तो हैं मगर यह थोड़ा और ज्यादा और अच्छा हो सकता था।

कहानी आपके मूड को बीच में ब्रेक जरूर कर देती है जब कहानी कभी भी भूतकाल और कभी भी भविष्य में आ जाती है इससे दर्शक के सीरीज को देखने के मजे को जरूर किरकरा हो जाता है।

जीत की ज़िद्द सीरीज के किरदार
अमित साध: मेजर दीपेंद्र सेंगर, अमृता पूरी: जया, सुशांत सिंह: कर्नल रणजीत चौधरी, परितोष सांद, अली गोनी, मृणाल कुलकर्णी, प्रीत कारन पहवा, गगन रंधावा

जीत की ज़िद्द सीरीज की कहानी
सीरीज की कहानी की शुरुआत होती है एक स्कूल पर हुए एक आतंकवादी हमले से जहाँ मेजर दीपेंद्र सेंगर अपनी टीम के सांथ वहां पहुंचते हैं सभी टेररिस्ट को ख़त्म कर देते हैं लेकिन इस घटना वह भी घायल हो जाते हैं। अब इस हमले के बीच में कहानी थोड़ा भूतकाल में भी जाती है जहाँ मेजर के बचपन और जवानी के दृश्यों को भी दिखाया जाता है की क्यों बचपन से ही मेजर का सपना रहा है आर्मी में जाने जबकि मेजर के घर वाले इसके लिए राज़ी नहीं होते हैं।

अब मेजर जोकि हॉस्पिटल में है तब वह खबर देखता है की कुछ आतंकवादियों ने हमारे देश के एक हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है ऐसे में मेजर जख्मी हालत में वहां जाते हैं जबकि उनकी गर्ल फ्रेंड जया इस बात से नाराज़ होती है। लेकिन इस बार उन्हें बहुत ही गंभीर चोट लगती है जिसके कारन वह कमर से निचे तक अपाहिज हो जाते हैं।

जया अपने प्यार को इस हालत में अपना सांथ देना चाहती है और वह मेजर से शादी कर लेती है लेकिन मेजर को अपनी जिंदगी भोझ लगने लगती है और वह अपने आप को बहुत ही मजबूर महसूस करते हैं। जया इसलिए कर्नल रणजीत चौधरी की सहायता लेती है ताकि मेजर को मन से टूटने से बचा सके और होता भी यही है मेजर अपने आपको इतना मजबूत बना लेते हैं की वह अपनी इस कमजोरी को हराकर फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो जाते हैं। इसी जज़्बे के सांथ यह फिल्म ख़त्म हो जाती है की आप तब तक नहीं हारते हैं जब तक की आप मन से हार न जाएं।

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