वफादारी के जज़्बे से भरी दरबान फिल्म का हिंदी में रिव्यू, फिल्म में क्या अच्छा है और क्या बुरा, किरदार, फिल्म की कहानी का प्लाट

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दरबान फिल्म कैसी है?
दोस्तों अगर आप इस मुश्किल समय में अपने परिवार के सांथ एक बेहतरीन अदाकारी और कहानी की तलाश कर रहे हैं तो आप इस फिल्म को जरूर एन्जॉय करेंगे। फिल्म आपके लिए प्यार और ईमानदारी की परिभाषा को अलग नज़रिये से पेश करती है जिसे इस आधुनिक समय में आप बहुत ही कम फिल्मो में देखेंगे। फिल्म को डायरेक्ट किया है बिपिन नाडकर्णी ने और लिखा है राधिका आनंद, राकेश जाधव, बिपिन नाडकर्णी ने हलाकि यह कहानी रविंद्र नाथ टैगोर के उपन्यास से ली गयी है। शायद इसलिए बिपिन नाडकर्णी ने इस फिल्म को बहुत ही सादगी के सांथ बनाया है ताकि फिल्म दर्शकों तक आसानी से अपने मैसेज को दे पाए।

फिल्म का स्क्रीनप्ले ही इसकी ताकत है जहाँ किरदारों ने इसपर अपने अभिनय से इसे और अच्छा बनाया है। फिल्म को एक पिता और एक नौकर की वफादारी और उसके समर्पण के आसपास लिखा गया है, जहाँ एक नौकर अपने मालिक के प्रति इतना वफादार है की वह मालिक के बच्चे को गलती से खो देता है तो उसके गम को अपने जीवन में बसा लेता है। नौकर के इस समर्पण को समाज किस रूप में देखता है यही इस फिल्म का समाज से सवाल है।

फिल्म में स्क्रीनप्ले की बात की जाये तो दरबान फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी अच्छा है मगर कई मौको में आप फिल्म से और अधिक इमोशंस की अपेक्षा करते हैं मगर उतना महसूस नहीं करते हैं। हलाकि यह उतनी बड़ी कमी नहीं है परन्तु अगर फिल्म की मुख्य ताकत ही इमोशंस हो तो वहां ऐसी फिल्म को अपने स्क्रीनप्ले में अधिक इमोशनल होना चाहिए। लेकिन फिर भी आप इस फिल्म के इमोशंस को बहुत पसंद करेंगे जोकि आपके दिल को जरूर छू जाएगी।

फिल्म में डायरेक्शन और सिनेमेटोग्राफी ज्यादातर जगहों पर काफी से आपको उस माहौल में बांधने में कामयाब होता है परन्तु अगर आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की बात की जाये तो वहां फिल्म मात खा जाती है। एक आम दर्शक के तौर पर आप इस बात पर गौर न करें परन्तु के क्रिटिक के तौर पर फिल्म में यह कमी जरूर नज़र आती है। 

लेकिन कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म काफी बेहतरीन है जिसमे की इसके संगीत का बहुत बड़ा योगदान है। कहानी के अनुसार ही संगीत भी काफी सरल और मनमोहक है जोकि सुनने में काफी अच्छा लगता है। हलाकि बैकग्राउंड संगीत की बात की जाये तो वह सामान्य है इसलिये फिल्म में सस्पेंस और थ्रिल का माहौल आपको महसूस नहीं होगा।

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दरबान फिल्म हमें देखनी चाहिए?
सादगी से भरपूर दरबान फिल्म हमें अपने परिवार के सांथ जरूर देखनी चाहिए।

दरबान फिल्म की रेटिंग कितनी है?
95% दर्शकों ने इस फिल्म को गूगल
पे पसंद किया है तो वहीँ इस फिल्म को IMDB पे 10 में से 7.4 की रेटिंग मिली है। हम इस सीरीज को 5 में से 2.5 स्टार देंगे।

दरबान फिल्म में क्या अच्छा है?
फिल्म में आपको सभी किरदारों का काम पसंद आएगा जिन्हे फिल्म में काफी समय दिया है दर्शकों के सांथ जुड़ने के लिए इसलिए आपको हर किरदार के सांथ इमोशनल संबंध बनाने में आसानी होगी।

फिल्म काफी इमोशनल है लेकिन डायरेक्टर ने इस बात को ध्यान में रखा है की इस फिल्म की कहानी कहीं धीमी न हो जाये और दर्शक बोर न हो जाये इसलिए फिल्म एक अच्छी गति से आगे बढ़ती है।

फिल्म का सरल म्यूजिक और सिंपल डायरेक्शन भी फिल्म को काफी मदद करती है दर्शकों को फिल्म से बांधने में जोकि फिल्म के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है।

दरबान फिल्म में क्या बुरा है?
फिल्म के क्लाइमेक्स में आपको इमोशंस की कमी महसूस होती है इसलिए आपको फिल्म में कुछ कमी महसूस होती है।

हलाकि फिल्म में सभी किरदारों का काम काफी बेहतरीन है मगर शारिब हाश्मी के अलावा बाकि किरदार को ज्यादा मौक़ा नहीं दिया है जोकि आपको थोड़ा मायूश करता है।

दरबान फिल्म के किरदार
शारिब हाश्मी, शरद केलकर, रसिका दुग्गल, हर्ष छाया

दरबान फिल्म की कहानी का प्लाट
फिल्म की कहानी की शुरुआत होती है जहाँ एक हवेली में एक परिवार रहता है जिसके यहाँ कई नौकर भी काम करते हैं। शारिब हाश्मी इस हवेली के मालिक का पसंदीदा नौकर होता है जोकि मालिक के बच्चे का ख्याल रखता है। लेकिन मालिक का काम बंद हो जाता है तो उसे अपनी हवेली बेचकर जाना पड़ता है जिसके कारन अब शारिब हाश्मी खेती करके अपने परिवार को पालता है। शारिब हाश्मी का कोई बच्चा नहीं होता इसलिए वह मालिक के बच्चे से काफी प्यार करता है लेकिन अब वह अकेला हो गया था।

कहानी के दुसरे पड़ाव में मालिक का बच्चा शरद केलकर अब बड़ा हो जाता है जोकि अच्छी नौकरी करता है इसलिए वह अपनी पुरानी हवेली को खरीद लेता है और वही रहने लगता है। अब शरद केलकर अपने बच्चे के लिए शारिब हाश्मी को काम पर रख लेता है लेकिन शारिब हाश्मी से बच्चा गुम हो जाता है जिसका जिम्मेदार शारिब अपने आपको मानता है इसलिए वह गाँव छोड़कर चला जाता है। शारिब अब पिता बन जाता है लेकिन फिर भी वह अपने मालिक के बच्चे के गुम होने का जिम्मेदार खुद को मानता है और वह अब अपने बच्चे को मालिक कहकर पुकारने लगता है।

शारिब का बच्चा पढ़ने में काफी अच्छा होता है इसलिए उसके टीचर शारिब को उसे बाहर पढ़ाने के लिए कहते हैं लेकिन अब शारिब अपने बच्चे को पूरी तरह से अपने मालिक का ही बच्चा समझने लगता है इसलिए अब वह अपने बच्चे को मालिक को दे देता है। यह फिल्म की कहानी आपको मजबूर कर देगी की किसके सांथ इन्साफ हुआ है।

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