‘भोंसले’ फिल्म का रिव्यू, पूरी स्टार कास्ट, फिल्म में क्या अच्छा है और क्या बुरा, फिल्म की कहानी हिंदी में

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मराठी और उत्तर भारतीय लोगो के बीच की झड़प दिखात्ती मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘भोंसले’।
मनोज बाजपेयी की अदाकारी का कोई जवाब नहीं एक साइलेंट किरदार से  भी  बहुत कुछ कह जाना ऐसा टैलेंट सिर्फ मनोज बाजपेयी ही दिखा सकते हैं। एक अद्रश्य किस्म की हिंसा पर आधारित फिल्म भोंसले जिसका निर्देशन देवाशीष मखीजा द्वारा किया गया है जिन्होंने मुंबई में मराठियों द्वारा बिहार, यू.पी. के लोगो के सांथ किये दुर्व्यवहार को दिखाने का साहस किया है। हालांकि फिल्म 2018 में ही बन चुकी थी लेकिन रिलीज़ नहीं हो पायी।

भोंसले फिल्म 1 घंटा 58 मिनट की फिल्म है जिसमे समाज की सचाई को दिखाया गया है। डायरेक्टर ने इस फिल्म को ड्रामा के जॉनर में रखा है और इस फिल्म को आप सोनी लिव की ऐप पर देख सकते है।

इस आर्टिकल को आप इंग्लिश में भी पढ़ सकते हैं।

‘भोंसले’ फिल्म में क्या अच्छा है?
फिल्म की कहानी काफी ज्यादा रियलस्टिक है जहांन हर छोटी छोटी बातों का विशेष ध्यान रखा गया है। मुंबई के चॉल और वहां के लोगो के रहने का तरीका बखूबी दिखाया गया है।

कहानी मनोज बाजपेयी के कंधो पर है जहाँ उन्होंने कहानी में जान डाल दी है। कैसे बिना वजह ही मराठी मिलकर बिहार और यू.पी. के लोगो को घर वापसी के लिए मजबूर कर रहे हैं जोकि एक सच्ची घटना पे आधारित है जिसमे उत्तर भारतीय इस हिंसा का शिकार हुए थे, ऐसी घटंनाओ को दिखाया जाना कबीले तारीफ है।

‘भोंसले’ फिल्म में क्या बुरा है?
कहानी में कुछ सींन को दोहराया गया है जिससे फिल्म लम्बी खींच जाती है और इसके कारण थोड़ा बोरियत भी महसूस होती है। कुछ चीज़ो की इतनी जरूरत न होने के बावजूद भी दिखाया गया है जोकि सिर्फ समय को बर्बाद करती है।

फिल्म  का डायरेक्शन, स्क्रीनप्ले और म्यूजिक
फिल्म का डायरेक्शन काफी अच्छा है और फिल्म की ख़ामोशी, दो स्टेट्स के लोगों के बीच की कश्मकश और अपने आप को बड़ा दिखाने की होड़ को अच्छे से फिल्म में दिखाया गया है। वहीँ बात की जाये फिल्म के स्क्रीनप्ले की तो जैसा हमने पहले भी बतया की फिल्म थोड़ा स्लो है, हो सकता है की दर्शक बोर हो जायें लेकिन फिर भी स्टोरीलाइन अपने सब्जेक्ट से भटकती नहीं है। फिल्म का म्यूजिक एक औसत के रूप में देखा जा सकता है।

‘भोंसले’ फिल्म की रेटिंग
इस फिल्म को IMDB पे 7.1 रेट मिला है 10 में से और वहीँ हम इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार देंगे।

‘भोंसले’ फिल्म की कहानी हिंदी में 
कहानी की शुरुआत होती है गणपति उत्सव की स्थापना से और खत्म होती है गणपति विसर्जन में कुल मिलाकर फिल्म 11 दिन की है। वहीँ एक चॉल में रहने वाले रिटायर पुलिस अफसर गणपत्त भोंसले (मनोज बाजपेयी) अपने अकेलेपन के सांथ ही खुश हैं और जिन्हे लोग काका कहकर बुलाते है। जो बिना कुछ बोले ही बहुत कुछ बोल जाने की क्षमता रखते हैं। वहीँ एक टैक्सी ड्राइवर विलास (संन्तोष जुवेकर) रहता है जो जीवन में काफी आगे बढ़ने और पैसा कमाने की लालशा में किसी पॉलिटीशन के कहने पर मराठी लोगो को इकठा करके बिहार और यू.पी. के लोगो को बिना वजह परेशान कर मुंबई से भगाने का काम करता है। जिसमे वह गणपत भोंसले को भी शामिल करना चाहता है लेकिन भोंसले हमेशा सच के सांथ खड़े रहते हैं।

वहीँ एक दिन नर्स सीता (इप्शिता चक्रबोर्ती सिंह) अपने छोटे भाई लाल (विराट वैभव) के सांथ भोंसले के बाजू वाले कमरे में रहने आ जाती है। 60 साल बाद भोंसले जिनका  कोई परिवार नहीं है वह धीरे धीरे सीता और लाल के करीब आ जाते हैं जो एक परिवार की तरह रहते हैं। वहीं एक दिन विलास सीता का रेप कर देता है और यहाँ से कहानी में टर्निंग पॉइंट आता है जब भोंसले सीता के सांथ हुए नाइंसाफी के लिए लड़ता है।

कहानी को काफी रियल रखा गया है जो छोटी छोटी डिटेल से बना हुआ है। जैसे भोंसले का छोटा सा कमरा जहाँ पानी टपकता है। किचन में कॉकरोच, बॉथरूम में छोटे से टुकड़ा साबुन का, एक पुराना रेडियो मनोरंजन के लिए, बहुत पुराने से बर्तन आदि जो फिल्म को सफल बनाने में कामयाब रहे हैं। मनोज बाजपेयी के कम डायलॉग होने के बावजूद भी हर बारीकी उनके चेहरे से समझ आती है।

‘भोंसले’ फिल्म की स्टार कास्ट
मनोज बाजपेयी जो कहानी में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं जिनकी चुपी ने ही फिल्म को सफल बना दिया है। संतोष जावेड़कर जो एक टैक्सी ड्राइवर हैं जिसके किरदार से आपको नफरत हो जाएगी लेकिन उनकी जबरदस्त एक्टिंग आपका दिल जित लेगी। इप्शिता चक्रबोर्ती सिंह के बोलने का तरीका और छोटी छोटी बातें बहुत कुछ कहती है। छोटा पैकेट बड़ा धमाका विराट वैभव की एक्टिंग काफी सराहनीय है।

अभिषेक बनर्जी जो मराठी मानुष के सामने खड़े रहने का साहस करते हैं हालांकि अभिषेक बनर्जी का रोल ज्यादा नहीं है लेकिन वह एक अच्छे कलाकारों में गिने जाते है।

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